(1)श्री महाप्रभुजी ने यह ग्रंथ अपने सेवक अम्बाला के नारायणदास कायस्थ (84वार्ता में 57 मी वार्ता) को पढ़ाया था। इस ग्रंथ के अध्ययन से उनकी चित्त वृत्ति अन्यमार्गीय साधन -फल के प्रति उदासीन होकर श्री महाप्रभुजी द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग मे स्थिर हो गयी।
(2) हर जीव की प्रवृत्ति आनंद की प्राप्ति के लिए ही होती है । इसी कारण हर मनुष्य की इच्छा दु:ख की निवृत्ति एवं सुख की प्राप्ति ही होती है। इसी को पुरुषार्थ (पुरुष की अर्थना यानी इच्छा) कहते है। मनुष्य की अगणित इच्छाओ को हमारे वेदादि शास्त्रो मे चार पुरुषार्थो मे बांटा है।【१】धर्म(शास्त्र मे निर्दिष्ट कर्तव्य)-【२】अर्थ(सम्पदा)-【३】काम( इन्द्रियों द्वारा विषय सुख की इच्छा)-【४】मोक्ष(जन्म-मृत्यु के कारणभूत अहंता ममतात्मक संसार की निवृत्ति एवं अपने सच्चे स्वरूप मे स्थिति)। काम ऐसा हो जो अर्थ को ही सिद्ध करे अनर्थ को नही। जो अर्थ धर्म आचरण के लिए हो वही सच्चा अर्थ है अन्य सभी अनर्थ है।धर्म से ही जीव मोक्ष प्राप्त करता है। अतः मोक्ष ही मुख्य पुरुषार्थ है । केवल त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) से जीव का कल्याण नही है। अतः बालबोध ग्रंथ मे मोक्ष पुरुषार्थ का ही निरूपण किया है। मोक्ष का निरूपण श्रुति मे स्पष्ट है किन्तु ऋषियो द्वारा बनाई हुई स्मृतियों मे मोक्ष का स्पष्ट निरूपण नही है क्योंकि ईश्वर की प्रेरणा से ही ऋषियो ने स्मृति मे श्रुति से विरूद्धांश का प्रतिपादन भी किया है। अतः बालबोध ग्रंथ में ऋषियो द्वारा स्मृति मे निरूपित शास्त्र प्रामाणित मोक्ष पुरुषार्थ का निरूपण हुआ है।
(3) किसी देव का आश्रय लिए बिना एवं इनके प्रसाद के बिना भी जीव स्वयं के उद्यम के द्वारा साधना आचरण से मोक्ष प्राप्त करे वह स्वतः मोक्ष है किन्तु किसी देव का आश्रय लेकर उनकी कृपा प्रसाद से मोक्ष प्राप्त हो वह परतः मोक्ष प्राप्ति का प्रकार है। इस प्रकार मे अपने इष्टदेव के अलावा अन्य सभी का अन्याश्रय त्याग आवश्यक है अन्यथा इष्टदेव की उपासना फलित नही होती है।सांख्य एवं योग साधना स्वतः मोक्ष का प्रकार है और भगवानश्री विष्णु एवं भगवान श्री शिव की उपासना का मार्ग परतः मोक्ष का प्रकार है।
(4) सांख्य साधना मे जड़ तत्व को प्रकृति कहते है इससे ही हमारे देह इन्द्रिय आदि हुए है और जीव चेतना को पुरुष कहते है। दोनो के संयोग ए ही यह पूरी सृष्टि ईश्वर ने रची है।अतः जड़ अनित्य है और चेतना नित्य है। अनित्य तत्व मे वैराग्य से उसका त्याग करना है और नित्य चेतन अपना ही स्वरूप है होने के कारण उसमे ही स्थित रहना है। यही आत्म बोध रूप मोक्ष है।
(5) योग साधना मे चित्त वृत्ति का परमात्मा मे निरोध करना ही मोक्ष है। यहा त्याग की प्रणाली नही है। अष्टांग योग (यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि ) के द्वारा आत्मदर्शन रूप मोक्ष प्राप्त होता है।
(6) इस जगत की उत्पत्ति स्थिति एवं लय के लिए एक ही ब्रह्म ने ब्रह्मा विष्णु शिव ऐसे तीन रूप धारण किये । इस कारण ब्रह्माजी मोक्ष दान नही करते क्योंकि सृष्टि सर्जन के कार्य मे मोक्षदान प्रतिबंधक है। भगवान शिव बहोत कर के भोग देते है एवं भगवान विष्णु मोक्ष देतेहै यद्यपि दोनो ही भोग व मोक्ष दोनो देने मे समर्थ होने के बावजूद भी क्योंकि जीव के स्वभाव को बदलने मे इनको महान श्रम होता है। किन्तु जो जीव इन देव को पूर्ण आश्रित एवं पूर्ण समर्पित होते है ऐसे अतिप्रिय जीव को भोग एवं मोक्ष दोनो ही प्राप्त हो जाते है। जीव स्वरूपतः निर्दोष है किन्तु स्वभाव से दुष्ट है इस दुष्ट स्वभाव को बदलने के लिए शास्त्र मे बताई नवधा भक्ति के साथ साथ स्वधर्म (देह धर्म) का पालन करना है अन्यथा दुगुना भार होता है। इस नवधा भक्ति से अपने इष्टदेव मे प्रेम प्रकट होता है। फिर इष्टदेव के प्रसाद से सायुज्यादि मोक्ष की प्राप्ति होती है।
(7) इस बालबोध ग्रंथ के मंगलाचरण मे ही सदानंद हरि को नमस्कार किया है। । जिस जीव को दुःख की निवृत्ति एवं सुख की प्राप्ति की इच्छा है उसे दीनता पूर्वक भगवान ‘हरि’ को नमन (हरि का शरण स्वीकारना) ही कर्तव्य है क्योंकि भगवान ‘हरि’ होने से सर्व दुःख की निवृत्ति करते है और सदानंद होने से सुख की प्राप्ति करानेवाले है
अतः वेदादि शास्त्रो मे पुरुषार्थ (दुख की निवृत्ति एवं सुख की प्राप्ति ) के लिए ही ही मुख्यतया कर्म,ज्ञान,उपासना,भक्ति,सांख्य,योग ऐसे अनेक साधन मोक्ष प्राप्ति के लिए बताये है। किन्तु इस कलियुग मे इनको साधना बड़ा ही कठीन है।इसके समाधान रूप मे श्री महाप्रभुजी ने बालबोध ग्रंथ के मंगलाचरण मे ही सदानंद हरि को नमस्कार किया है। । जिस जीव को दुःख की निवृत्ति एवं सुख की प्राप्ति की इच्छा है उसे दीनता पूर्वक भगवान ‘हरि’ को नमन (हरि का शरण स्वीकारना) ही कर्तव्य है क्योंकि भगवान ‘हरि’ होने से सर्व दुःख की निवृत्ति करते है और सदानंद होने से सुख की प्राप्ति करानेवाले है। अतः भगवद् शरणागति का मार्ग ही जीव के पुरुषार्थ को सिद्ध करने मे सरलतम मार्ग है। कृष्ण एव गतिर्मम (श्री कृष्ण को ही साधन और फल के रूप मे स्वीकारना एवं उन्हीं को रक्षक मानना। श्री कृष्णः शरणं मम।
महाप्रभु श्रीवल्लाभाचर्यजी ने वेद-गीता-ब्रह्मसूत्र-भागवत इन चारो प्रमाणों की एकवाक्यता के आधार पर साकार ब्रह्मवाद नामक तत्वदर्शन का निरूपण किया है एवं इस साकारब्रह्मवाद के आधार पर आपने कर्तव्य रूप मे सदा श्रीकृष्ण सेवा के सिद्धांत का निश्चय यहा किया है।
साकार ब्रह्मवाद :
(1) यहा पर उत्पन्न होने वाली सृष्टि एवं सृष्टि का कर्ता, जिस की रक्षा हो रही वह सृष्टि एवं रक्षा करने वाला और जिस सृष्टि का लय हो रहा है वह सृष्टि एवं प्रलय कर्ता सभी कुछ ब्रह्म ही है। एक ब्रह्म ही अनेक नाम -रूप-कर्म के रूप मे प्रकट हुआ है।
(2) सत् (अस्तित्व)-चित् (खुद के अस्तित्व का ज्ञान होना)-आनंद( अनंतता) ही ब्रह्म का लक्षण है। समस्त जड़ सृष्टि इस ब्रह्म की सदंश है जीव सृष्टि चिदंश है और अंतर्यामी (ईश्वर) आनंद मे से प्रकट हुए है।
(3) इस ब्रह्म तत्व के दो पक्ष है एक धर्मी या धामि स्वरूप जो साकार है और दूसरा धर्म या धाम स्वरूप जो व्यापक है। साकार पक्ष परं ब्रह्म श्रीकृष्ण है और व्यापक पक्ष अक्षर ब्रह्म है। केवल भक्ति से ही श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है।
(4) इस अक्षर ब्रह्म के दो रूप है यह परिद्रश्यमान समस्त जगत जिसमे आनंद का तिरोभाव है केवल सत्-चित् प्रकट है और इस जगत से जो विलक्षण रूप है उसमे सत्-चित्-आनंद तीनो धर्म प्रकट है जहा ज्ञानीओ की मुक्ति होती है।
(5) इसजगत का प्राकट्य अक्षरब्रह्म से ही होता है।इस लिए कार्य रूप जड़-जीवात्मक जगत ब्रहमात्मक है।और इस जगत का ब्रह्म अभिन्न निमित्त उपादान कारण है।
(6) इस ब्रह्म का अविकृत परिणाम यह जगत है।
(7) ब्रह्म के तीन पक्ष है पर ब्रह्म श्रीकृष्ण आधिदैविक है अक्षरब्रह्म आध्यात्मिक है और जगत आधिभौतिक है जैसे गंगा देवी आधिदैविक है, तीर्थात्मक गंगा आध्यात्मिक है एवं जल रूप गंगा आधिभौतिक है।
(8) यह जगत भगवान की सदंश रूप प्रकृति से बना होने से त्रिगुणात्मक (सात्विक-राजस्-तामस) है। इन तीनो गुणों का(राजस्-सात्विक-तामस) नियमन के लिए हीअनुक्रम से परं ब्रह्म श्री कृष्ण के ही तीन गुणावतार है ब्रह्मा-विष्णु-शिव ।
श्रीकृष्ण सेवा :
(1) यह जगत निरानंद है, जीव गुप्तानंद है किन्तु हरि पूर्णानंद है इस लिए आनंद की प्राप्ति के इच्छुक भगवान के चिदंश सहज गर्भ दास रूप जीव को भगवान श्री कृष्ण की ही सेवा करनी चाहिए।
(2) श्री कृष्ण मे चित्त का प्रवण हो जाना ही सेवा का स्वरूप लक्षण है। जिसका चित्त भगवान मे प्रवण है वही श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए कार्य कर पाता है। जिसकी सेवा की जाय उसकी प्रसन्नता जिससे हो वही सेवा है।
(3) इस सेवा के दो प्रकार है एक साधन रूप स्वयं के घर मे होती तनुवित्तजा सेवा कि जिससे प्रभु मे चित् प्रवणता सिद्ध होती है और दूसरी फलरूप मानसी सेवा कि जिसमे भक्त का चित्त प्रभु मे ऐसा लग जाय की प्रभु के अलौकिक स्वरूप का एवं भजन का आनंद ले पाता है । संसार दुःख की निवृत्ति एवं ब्रह्म ज्ञान तो इस सेवा का आनुषंगिक फल है।
(4) तनुवित्तजा सेवा का प्रकार है व्यक्ति अपने ही घर मे अपने परिवार के साथ अपना सर्वस्व प्रभु की सेवा मे समर्पण करे। साकार ब्रह्मवाद के कारण स्वयं के घर मे बिराजते सेव्य स्वरूप परम ब्रह्म कृष्ण ही है । गृह सेवा मे अन्य से द्रव्य लेकर सेवा नही करनी है और न ही अन्य को द्रव्य देकर सेवा करवानी है। इस गृह सेवा मे अन्य से द्रव्य लेकर प्रभु सेवा करने से एवं अन्य को द्रव्य देकर प्रभु सेवा करने से चित्त प्रभु मे नही जुड़ता है क्योंकि अन्य (जो स्वीय न हो) से द्रव्य लेकर तनुजा सेवा करने पर वह सेवा बिक जाती है और इस अन्य से लिए हुए द्रव्य को प्रभु अंगीकार नही करते है। अतः वह असमर्पित ही रहता है। अपनी लाभ या पूजा के लिए सेवा करने पर तो देवलक पाखंडी होंने का पाप भी होता है।अन्य को द्रव्य देकर सेवा करने पर देनेवाले का अहंकार बढ़ता होने से चित्त प्रवण नही हो पाता है।
(5) जो व्यक्ति लोकार्थि (कृष्ण सेवा से लौकिक भोग की पूर्ति की इच्छावाला ) होकर कृष्ण सेवा मे जुड़ता है उसके लौकिक भाव को प्रभु पोषण नही करते है। अतः उसे क्लेश होता है।जिस कारण जन्मान्तर मे अंगीकार होने से फल प्राप्ति मे विलंब होता है।
(6)पुष्टिमार्गीय जीव जिसे प्रभुका माहातम्य ज्ञान एवं स्वयं के स्वरूप का ज्ञान का अभाव है फलतः चित्त की चंचलता है उन्हें श्री भागवत मे तत्पर होकर एकादश स्कंध मे कही पूजा की रीति एवं पर्व मे अनेक उत्सव प्रभु के जहां होते हो वहां भक्तो के साथ या फिर अकेले ही रहना है किन्तु ऐसे मर्यादा जीव को भागवत मे तत्पर होकर श्रीगंगाजी जैसे पवित्र तीर्थ स्थानों मे रहना है।
एक ही ब्रह्म ने अपनी क्रीड़ा के लिए विविध नाम-रूप-कर्म रूप यह सृष्टि अपने आत्मरमण के रूप मे प्रकट की है क्योंकि वैविध्य के बिना रमण संभव नही है। इसी कारण ब्रह्म के अंश रूप हम जीवो मे भी भगवदिच्छा से विविध स्वभाव प्रकट हुए है। अतः प्रभु के द्वारा प्रकटित पुष्टि-प्रवाह-मर्यादा नाम वाले तीन मार्ग , उन मार्ग पर चलनेवाले तीन प्रकार के जीव एवं इन मार्ग से इन जीव को प्राप्त होने वाले तीन प्रकार के फल का निरूपण इस ग्रंथ मे हुआ है।
प्रवाह मार्ग-जीव-फल:-
भगवान की इच्छा से प्रभु के मन से प्रवाही जीव प्रकट हुए है। ये जीव स्वयं के मन माने ढंग से बनाये गए मार्ग पर चलते है और उनके अच्छे बुरे कर्म अनुसार उन्हें फल की प्राप्ति होती है।
मर्यादा मार्ग-जीव-फल:-
मर्यादा जीव प्रभु की वाणी से प्रकट होने के कारण प्रभु के सामान्य अनुग्रह से वे वेदादि शास्त्रो मे बताई हुई मर्यादा रूप मार्ग पर चल पाते है। और उन्हें इन शास्त्रोक्त मार्ग मे बताये लौकिक-पारलौकिक-मुक्ति आदि फल अधिकार अनुसार प्राप्त होते है।
पुष्टि मार्ग-जीव-फल:-
पुष्टि जीव प्रभु की काया से प्रकट होने के कारण भगवान के विशेष अनुग्रह से वे भक्तिमार्ग पर चलकर जहां केवल साक्षात भगवान एवं इनका भजन ही फल है वह प्राप्त कर लेता है। इन जीव को लौकिक-पारलौकिक-मुक्ति आदि फल की प्राप्ति मे रुचि नही होती है वे तो स्वयं भगवान रूप फल ही चाहते है क्योंकि भगवान के स्वरूप सेवा के लिए ही पुष्टि जीव प्रकट हुए है अन्यथा यह सृष्टि प्रकट ही न होती। इन जीवो को प्रभु ने उत्तम बताया है क्योंकि ये जीव प्रभु को ही अपनी आत्मा मानते होने से प्रभु के अत्यंत प्रिय है। लौकिक या वैदिक साधन-फल मे से निष्ठा का त्याग कर केवल प्रभु एवं उनकी निरुपाधिक भक्ति मे ही निष्ठा होना वह केवल भगवान के विशेष अनुग्रह से ही शक्य है अन्य किसी से नही।प्रभु जब इन जीवो की लौकिक-वैदिक आसक्ति या फिर अहंकार जैसे दोष देखते है तो इन्हें शुद्ध करने हेतु शाप भी दिलाते है।
चर्षणी जीव:
इन जीवोको इन तीनो मार्गो मे स्थायी रुचि नही होती किन्तु सभी मार्ग मे भटकते रहते है और अपने अपने कर्म या वासनानुसार फल प्राप्त करते है।यह एक प्रकार कि प्रवाही सृष्टिका प्रकार भेद हैं।
अतः यह ग्रंथ दर्पण की तरह हमारा स्वरूप हमे दिखाता है।
श्रीमहाप्रभुजी के प्राकट्य का एक मुख्य प्रयोजन है- पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन कर पुष्टिजीवो को प्रभु की सेवा मे जोड़ना। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण गुण निधान है और जीव तो स्वभाव से सदोष है। इस कारण जीव प्रभु सेवा के लिए योग्य नही है। इस श्रीमहाप्रभुजी की चिंता का समाधान करने के लिए भगवान श्री कृष्ण श्रावण शुक्ल एकादशी की रात्रि को श्रीमद् गोकुल मे श्रीयमुनाजी के गोविन्द घाट पर श्रीमहाप्रभुजी के समक्ष प्रकट हुए और सिद्धांत (श्री कृष्ण सेवा) रहस्य (निवेदन) का उपदेश प्रदान किया। इस भगवद् आज्ञा का श्रीमहाप्रभुजी ने अक्षरशः इस सिद्धांत रहस्य ग्रंथ मे निरूपण किया है। निवेदन का अर्थ है प्रभु को जताना की हमारी अहंता रूप देह इन्द्रिय प्राण अंतःकरण एव ममता रूप स्त्री पुत्र आप्तजन घर धन सभी ऐहिक एव पारलौकिक सभी व्यक्ति वस्तु भगवान की सेवा के लिए है हमारे भोग विलास के लिए नही। इस निवेदन से जीव का संबंध परम ब्रह्म श्री कृष्ण से होता है। पुष्टिमार्ग के आचार्य द्वारा पुष्टिजीव प्रभु के समक्ष निवेदन करता है। इसी का नाम ब्रह्मसबंध है। इस ब्रह्मसंबंध से जीव की आधिदैविक शुद्धि होने से सहज-देशोतथ्-कालोतथ्-संयोगज-स्पर्शज यह पञ्च विध दोष भगवत् सेवा मे बाधा नही करते। ब्रहमसंबंधि जीव का कर्तव्य है
(1)अपने घर मे निवेदित पदार्थो से प्रभु की सेवा समर्पण पूर्वक करनी है। यदि गृह सेवा की अनुकूलता नही है तब ब्रहमसंबंध नही लेंने मे कोई दोष नही है किन्तु ब्रहमसंबंध के बाद प्रभु सेवा न करने पर भगवद् अपराध होता है
(2)सभी कुछ (अन्न वस्त्र इत्यादि) प्रथम प्रभु की सेवा मे यथा योग्य विनियोग करके ही स्व उपभोग भगवद् प्रसाद के रूप करना है किन्तु असमर्पित भोग का त्याग ही करना है।
(3) प्रभु की सेवा मे हमारा अर्ध भुक्त अर्पण नही करना है। इस तरह से जीव ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है जिस तरह गंगा मे मिले सभी तरह के जल भी गंगा के रूप मे ही माने जाते है। पुष्टि जीव प्रभु की सेवा अपने स्वामी के रूप मे खुद के घर मे करता है इसी कारण सेवा मे निवेदन -समर्पण का ही व्यवहार होता है दान का नही। अतः प्रभु को दान दी हुई वस्तु खुद के उपयोग मे लाने से देवद्रव्य उपभोग का दोष यहा गृह सेवा मे लागू नहीं होता है क्योंकी गृह सेवा मे समर्पण से ही सभी व्यवहार होते है दान से नही।निवेदन मे वस्तु पर स्वामित्व का त्याग नही है केवल अहंता ममता का त्याग है किंतु दान मे स्वामित्व का त्याग है। यही दोनो मे भेद है। अपने घर के सेव्य प्रभु की सेवा मे जो निवेदित है उसी का समर्पण होता है अनिवेदितका नही। अतः अन्य से प्राप्त द्रव्य अनिवेदित होने के कारण उसला समर्पण नही हो सकता है। वह तो असमर्पित ही है।
श्री महाप्रभुजी ने गोविन्द दूबे के मन मे सेवा के समय होती व्यग्रता को नवरत्न ग्रंथ के उपदेश द्वारा दूर की थी। कृष्ण सेवा मे प्रतिबंध रूप सभी लौकिक एवं अलौकिक चिंताओं का निवारण श्री महाप्रभुजी ने इस ग्रंथ मे किया है। जिस जीव ने प्रभु की शरणागति ली है एवं आत्मसमर्पण किया है ऐसे जीव को तो यह लोक या परलोक की कोई चिंता होती ही नही है। किन्तु भगवदर्थ चिंता यदि होती हो तो मुख्यतः निम्नलिखित विवेक-धैर्य-आश्रय रूप उपदेश चिंता के निवारण रूप मे इस ग्रंथ मे दिए है:-
विवेक:
(1) सेवोपयोगी या अनुपयोगी वस्तु की प्राप्ति विषय मे या स्वयं के या स्वयं के परिवार जन के अन्य विनियोग (सेवा से अतोरीक्त अन्य मे) के विषय मे या स्वयं की लौकिक आसक्ति के विषय मे होती चिंता का समाधान हैआत्मनिवेदन के स्वरूप का चिंतन
(2) हमारे आत्मनिवेदन का स्वीकार प्रभु ने किया है की नही इस विषय होती चिंता का समाधान है भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप का चिंतन
(3) लौकिक या वैदिक व्यवहार मे स्वस्थता न निभने के कारण होती चिंता का समाधान है भगवान के द्वारा जीव के अंगीकार के स्वरूप का चिंतन एवं लौकिक वैदिक मे स्वयं के साक्षीभाव का चिंतन
(4) भगवद् सेवा मे गुरु आज्ञा और भगवद् आज्ञा मे भिन्नता होने से आज्ञा पालन मे होती चिंता का समाधान है भगवद् सेवा मे भगवान की प्रसन्नता के तात्पर्य का चिंतन
धैर्य:
(5) ऊपर कहे हुए समाधान से भी यदि चिन्ता का निवारण शकय न होने के कारण होती चिंता का समाधान है भगवद् लीला की भावना एवं
आश्रय:
(6) भगवद् शरणागति की भावना
इस ग्रंथ श्रीमहाप्रभुजी ने विवेक , धैर्य , एवं आश्रय का निरूपण किया है। जीव का भगवान के प्रति अनन्य आश्रय का भाव होना ही पुष्टिमार्ग की आधारशिला है। आश्रय का स्वरूप लक्षण यह है की इस लोक एवं परलोक (मृत्यु के बाद) मे श्री हरि (भक्तो के दुख दूर करनेवाले) ही मेरे रक्षक है ऐसा भाव स्थित होना।जीवन की सुख-दुख की सभी परिस्थितियों मे इस भाव का विस्मरण कभी नही होना चाहिए एवं काया-वाणी-मन से इस शरणागति के भाव को दृढ़ रखना है। इस भाव की द्रढता के लिए (1)श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य के आश्रय का त्याग, (2)इन प्रभु मे द्रढ़ विश्वास एवं (3)सभी लौकिक वेदिक कार्यो को प्रभु आज्ञा समझ कर उनकी प्रसन्नता के लिए करते हुए जो कुछ भी प्राप्त हो जाय उसका ममता रहित होकर सेवन करना है। इस कलियुग मे कर्म,उपासना आदि मर्यादा मार्गीय कठीन साधन से फल सिद्ध होना दुस्साध्य है। अतः सभी के लिए सदा प्रभु का यह शरण मार्ग हितकारी है। इस आश्रय (शरण) के भाव के पोषण के लिए विवेक एवं धैर्य के भाव को भी दृढ करना है। आश्रय द्रढ़ होने पर तो विवेक एवं धैर्य दृढ हो ही जाते है किन्तु यदि विवेक-धैर्य अच्छीतरह न भी निभा सके तब भी श्रीकृष्ण के आश्रय को तो नही ही छोड़ना है क्योंकि विवेक-धैर्य भी आश्रय के लिए है।
ब्रह्माण्ड के सारे क्रिया कलाप भगवान की क्रीड़ा के अंग होने से इस सृष्टि मे घटित होता सभी कुछ सर्व दुखहारी श्रीहरि की स्वयं की इच्छासे ही हो रहा है और उसमे किसी न किसी तरह हमारा हित ही छुपा हुआ है- ऐसी हमारे हृदय एवं बुद्धि मे भावना सदा बनी रहे इसी का नाम ‘विवेक’ है। इस विवेक के भाव को द्रढ़ करने के चार उपाय है (1) प्रभु से याचना का त्याग क्योंकि प्रभु के की अभिप्राय का जीव को ज्ञान नही है एवं सर्व सामर्थ्यवान प्रभु का ही सब कुछ सर्वत्र है। (2) जीव प्रभु के आधीन होने से कर्म करने मे स्वयं मे मिथ्या अभिमान की वृत्तिका त्याग कर भगवान की आज्ञा जिसमे आप की प्रसन्नता हो वह करना। (3) किन्तु आपत्ति काल मे इस आज्ञा के पालन का हठ का त्याग कर पुनः आपत्ति निवृत्त होने पर आज्ञा पालन (4) प्रभु आज्ञा जहा उपलब्ध न होती हो उसमे अनाग्रह का भाव रखकर पूर्व मे ही धर्म -अधर्म का विचार कर जिसमे स्वधर्म निभता हो वह कार्य ही कर्तव्य है।
धैर्य का अर्थ है जन्म से मृत्यु पर्यन्त सभी तरह के दुखो को सहन कर लेना। इस धैर्य को धारण करने के उपाय है (1) भगवद् इच्छा से सहज प्रतिकार के उपाय यदि प्राप्त हो तो दुख सहन का अनाग्रह रखना (2) अन्यथा सहन करना (3) अपनी ओर से सभी इन्द्रियों के व्यापारों को स्थगित कर लौकिक विषयो का त्याग।(4) यह शक्य न होने पर स्वयं की असामर्थ्य की भावना करनी जिससे विषय भोग मे ग्लानि एवं वैराग्य होगा।
संकलन : योगेश र गोस्वामी (मुम्बई गोकुल सप्तम गृह)।
श्री महाप्रभुजी ने अपने सेवक राणा व्यास को यह चतुःश्लोकी ग्रंथ पढ़ाया था जिससे उन्हें अपने वास्तविक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप पुरुषार्थ का ज्ञान हुआ और वे मिथ्या वैराग्य,धन, तथा विद्वत्ता के अहंकार से मुक्त हो गए। श्री महाप्रभुजी ने एक संग्रह श्लोक पुष्टिमार्गीय चतुर्विध पुरुषार्थ को समझाने केलिए दिया है।
पुष्टिमार्ग मे श्री हरि का दास होना ही धर्म (कर्तव्य) है, पुष्टिभक्तो के अर्थ(सम्पदा) स्वयमेव श्री हरि है, श्री हरि के दर्शन की कामना ही काम (इन्द्रियों की इच्छा) है तथा सर्वात्मना श्री कृष्ण का बन जाना ही पुष्टिभक्त का मोक्ष है।
वृजाधिप का सर्वभाव से (शरणागति एवं समर्पण के भाव से) सदा भजन करना ही पुष्टि जीव का आत्म धर्म है।
इस धर्म को अच्छी तरह निभाने पर प्रभु भक्त के अर्थ बन जाते है। जैसे धन कमाने के लिए हम अच्छीतरह हृदय से प्रवृत्ति मे जुड़ जाते है एवं अर्जित धन की सुरक्षा सावधानी से करते है इसी तरह प्रभु रूप धन को सम्हालना है। तब प्रभु हमारे अर्थ बन जाते है । फिर जीव निश्चिंत हो जाता है। जब प्रभु ही अर्थ बन जाते है तब इस प्रभु प्रेम के कारण प्रभु संबंधी इच्छाए पुष्टिजीव मे प्रकट होती है और उन्हें लौकिक -वैदिक फल के आकर्षण नही सुहाते है। सदा हर इन्द्रियों से भगवान के स्वरूपानंद एवं भजनानंद की इच्छा बनी रहती है। प्रभु मे इस प्रकार की आसक्ति का नाम पुष्टिमार्गीय काम पुरुषार्थ है।
जब पुष्टि जीव के जीवन मे श्री गोकुलेश के चरणारविन्द का भजन एवं स्मरण निरंतर होने लग जाय तो वही उसकी भक्ति व्यसन अवस्था रूप मोक्ष है क्योंकि जब प्रभु प्रत्यक्ष बिराज रहे तब संयोग रस का अनुभव सेवा के रूप मे और प्रभु परोक्ष मे विप्रयोग रस का अनुभव स्मरण के रूप मे भक्त लेता है। एक क्षण भी प्रभु बिना रह नही पाता है एवं जगत को भूलकर सर्वात्मना प्रभु से जुड़ जाता है।
श्री आचार्यचरण ने इस ग्रंथ की रचना आप के सेवक पुरुषोत्तम जोशी के लिए की है। भक्ति की व्याख्या है माहात्म्य ज्ञान पूर्वक सुदृढ़ सर्वतोधिक स्नेह ।यह भक्ति क्रमशः भगवान के प्रति प्रेम-आसक्ति-व्यसन-सर्वात्मभाव के रूप मे विकसित होती है। जिस व्यक्ति पर हरि कृपा (कृपा रूप बीज भाव) तनिक भी नही है उसे इस पुष्टिमार्ग मे कुछ भी सिद्ध नही हो पाता है, किन्तु जिस पर भगवान की कृपा है उसको इस मार्ग मे भगवान के प्रति भक्ति कैसे विकसित होती है उसके उपायो का (कारणो का) निरूपण श्री महाप्रभुजी ने इस ग्रंथ मे किया है। भगवान के प्रति प्रेम रूप भक्ति हो जाने पर लोक मे स्नेह का नाश होता है, प्रभु मे आसक्ति हो जाने पर गृहादिक मे अरूचि हो जाती है क्योंकि घर मे रहे हुए भक्ति मे निरुपयोगी व्यक्ति या वस्तु मे बाधकता एवं अनात्मीयाता दिखाई देती है, श्री कृष्ण मे व्यसन तभी होता है जब एक क्षण भी जीव प्रभु बिना नही रह पाता है इसी मे उसकी कृतार्थता है एवं बीज भाव की द्रढता है, व्यसन के बाद सर्वात्मभाव सिद्ध होने पर पुष्टि जीव प्रभु सेवा (संयोग) मे सभी इन्द्रियों से प्रभु के स्वरूप एवं भजन का आनंद लेता है एवं स्मरण (विप्रयोग) मे सर्वत्र प्रभु का अनुभव होने लग जाता है। इस भक्ति वर्धन के उपायो का वर्णन इस ग्रंथ मे निम्नलिखित रूप मे हुआ है–
(1) प्रभु सेवा मे प्रतिकूल व्यावृत्ति को छोड़कर स्वयं के घर मे ही कृष्ण सेवा फल रूप मानकर स्वधर्म को निभाते हुए श्रवणादि पूर्वक (नवधा भक्ति ) करनी है।
(2) यदि प्रभु सेवा मे प्रतिकूल व्यावृत्ति का त्याग न हो पाता हो तो ऐसे पुष्टि जीव को ऊपर बताया हुआ गृह सेवा का प्रकार न बताकर श्री महाप्रभुजी ऐसे जीव के लिये हरि मे शरण की भावना रखते हुए भगवान के स्वरूप-गुण-लीला-नाम का श्रवण-कीर्तन-स्मरण का प्रकार दिखाते है।
(3) ऐसे व्यावृत्त जीव भी यदि अनूकूल हो तो हरि स्थान मे चित्त मे दोष न आये वैसे प्रकार से भगवदियो का संग करे जिससे परिचर्या एवं भगवद् कथा श्रवण का अवसर प्राप्त हो।
(4) यदि उपर्युक्त प्रकार से सेवा या कथा न निभ पाये तो उद्विग्न चित्त होकर एकांत वास इष्ट नही किन्तु हरि शरणागति से ही सब सिद्ध होगा ऐसा भाव बिना संशय के रखना है।
(5) व्यसन अवस्था प्राप्त जीव को भक्ति प्रतिकूल गृह मे निरंतर न रहकर , मन मे एक प्रभु के मिलन की अभिलाषा रखकर गृह त्याग करना ही उचित है एवं तीर्थाटन करना है किन्तु यदि ऐसि व्यसन अवस्था प्राप्त नही हुई है तब तो अन्न एवं संग दोष से बचने के लिए घर मे ही रहना उचित है।
प्रभु की सेवा और/ अथवा कथा मे जिसकी आसक्ति जीवन पर्यन्त रहती है उसके बीज भाव का कभी भी नाश नही होता है ऐसी श्री आचार्यचरण की मति है। इस प्रकार जो इस भक्ति वर्धिनी ग्रंथ का अर्थ अनुसंधान सहित अध्ययन करता है उसकी भी श्री कृष्ण मे रति द्रढ़ होगी !! संकलन :योगेश गोस्वामी (मुम्बई-गोकुल-सप्तम गृह)
भक्तिवर्धिनी ग्रन्थ में अव्यावृत्त जीव को सेवा के अनवसर में तथा व्यावृत्त जीव से सेवा न निभनेपर भक्ति के बीज भाव की द्रढता के लिए प्रभु के नाम-लीला-गुण-स्वरुप का श्रवण -कीर्तन-स्मरण में तत्पर रहने का उपाय बतलाया है। श्रवण भक्ति के लिए भगवत्कथा में योग्य वक्ता की अपेक्षा रहती है एवं कीर्तन भक्ति के लिए योग्य श्रोता की अपेक्षा रहती है । अतः जलभेद में योग्य वक्ता का स्वरुप तथा पंचपद्यानि में योग्य श्रोता का स्वरुप समझाया है क्योंकि योग्य वक्ता तथा योग्य श्रोता के अभाव में भगवत्कथा में रसाभास होने की एवं बीजभाव के भी दृढ होने के बजाय खंडित होने की संभावना बनी रहती है ।
इस जलभेद ग्रन्थ में वक्ताओं के भावो की तुलना जल के साथ की होने से इस ग्रन्थ का नाम जलभेद है। जैसे एक रूप जल स्वतः शीतल स्वच्छ मधुर सर्वशोधक एवं ताप नाशक होने पर भी जिस आधारभूमि में भरा हुआ होता है वहा के गुणधर्मो से युक्त होकर अनेकरूपता प्रकट करता है ठीक उसी तरह श्री हरि के सर्वतापहारी एवं सर्व सुखकारी एक रूप गुण भी वक्ताओं की योग्यता एवं भावो के अनुरूप अनेकरूपता धारण कर लेते है।
तैत्तिरीय संहिता में जल के बीस रूप बताये है उसी के आधार पर यहाँ वक्ताओं के भी बीस रूप गिनाये है।
(1) जो वक्ता या गायक भगवान के गुणगान को आजीविका बनाकर उदर या कुटुम्ब का पोषण करते है उनके भाव तो घर की गन्दी मोरियोमे से निकलनेवाला मलिन जल चारो और फैल न जाए इसके लिए गढ्ढे खोदे जाते है वैसे होने के कारण उनके मुख से किया हुआ श्रवण ,भक्ति भाव नहीं बढ़ाता है बल्कि खंडित करनेवाला होता है ।अतः वह ग्रहणीय भी नहीं है।
(2) इसी तरह मर्यादा मार्ग के अंतर्गत कर्म मार्गीय-ज्ञानमार्गीय-उपासना मार्गीय (श्री कृष्ण से अतिरिक्त अन्य देव के उपासक) वक्ता के मुख से श्रवण भी कृष्ण भक्ति का वर्धन नहीं कर पाता है।
(3) निरपेक्ष पुष्टिभक्तिमार्गीय वक्ता जो भगवान के सच्चिदानंदात्मक अप्राकृत गुणों का वर्णन करने में तत्पर है एवं प्रभु के गुणगान अन्य किसी प्रयोजन से नहीं करते है किन्तु फलरूप मानकर करते होने से उनके मुख से किया हुआ श्रवण, भाव को दृढ करता है क्योंकि ये मीठे समुद्र जल के समान है।संकलन :योगेश गोस्वामी (मुम्बई-गोकुल-सप्तम गृह)।
भक्तिवर्धिनी ग्रन्थ में अव्यावृत्त जीव को सेवा के अनवसर में तथा व्यावृत्त जीव से सेवा न निभनेपर भक्ति के बीज भाव की द्रढता के लिए प्रभु के नाम-लीला-गुण-स्वरुप का श्रवण -कीर्तन-स्मरण में तत्पर रहने का उपाय बतलाया है। श्रवण भक्ति के लिए भगवत्कथा में योग्य वक्ता की अपेक्षा रहती है एवं कीर्तन भक्ति के लिए योग्य श्रोता की अपेक्षा रहती है । अतः जलभेद में योग्य वक्ता का स्वरुप तथा पंचपद्यानि में योग्य श्रोता का स्वरुप समझाया है क्योंकि योग्य वक्ता तथा योग्य श्रोता के अभाव में भगवत्कथा में रसाभास होने की एवं बीजभाव के भी दृढ होने के बजाय खंडित होने की संभावना बनी रहती है ।
पंचपद्यानि ग्रन्थ में भक्तिमार्गीय उत्तम-मध्यम-अधम श्रवण अधिकार का वर्णन है।
(1) उत्तम श्रवणाधिकार : इनकी भक्ति व्यसन अवस्था वाली होने से वे चाहे या न चाहे उनकी वाणी और श्रवणेंद्रिय निरन्तर भगवद् कथा में ही लगी रहती है एवं प्रभु के दिव्य चरित्र में अरति निवृत्त हो जाती है। इनका चित्त न तो लौकिक विषयोकी ओर आकृष्ट होता है और न वैदिक मोक्षादि फलोकी और ही। ऐसे श्रोता भगवल्लीलाके श्रवण की उत्सुकता के कारण सदा भगवदियोका सत्संग खोजते रहते है।
(2) मध्यम श्रवणाधिकार : इन श्रोताओ का मन कृष्णभक्ति के रस में इतना आर्द्र होता है की कथा श्रवण के समय में ये भगवद् स्मृति से विव्हल ही जाते है। इनकी निष्ठा भगवान के स्वरुप-गुण-लीला के श्रवण में बड़ी प्रबल होती है। जिस कारण ज्ञान के तुलना में प्रेम की प्रधानता स्पष्ट विद्यमान होती है।
(3) अधम श्रवणाधिकार : पूर्व श्रोता की तुलना में इनमे प्रेम के बजाय ज्ञान की प्रधानता होने के कारण कभी कभी ही ये स्नेह से विकल हो पाते है। प्रभु का निसंधिग्ध ज्ञान के कारण श्री कृष्ण का ही सर्वभाव से भजन रूप आस्था सदा बनी रहती है होने पर भी स्नेह निरंतर प्रकट नहीं रहता है। इस कारण कथा काल के बाद पुनः ये अन्यासक्त हो जाते है।
(4) इन भक्तिमार्गीय श्रवणाधिकार के अतिरिक्त एक अन्याश्रयरहित प्रपत्तिमार्गीय श्रवणाधिकार भी है । जो अन्य मार्गीय श्रोताओकी अपेक्षा उत्तमा धिकारी है क्योंकि देश काल द्रव्य कर्ता मन्त्र कर्म आदि अनेकविध धार्मिक साधनो के अभिमान छोड़कर श्री कृष्णके स्वरुप-गुण-लीलाओके श्रवण-कीर्तन-स्मरण में इनके मन की अनन्य रूचि होती है। श्री कृष्ण का सायुज्य लाभ इन्हें मृत्यु के पश्चात ही प्राप्त होने से इन्हें ‘मर्त्य’ कहा है।
संन्यास निर्णय ग्रन्थ की रचना श्री वल्लभाचार्यचरण ने उनके सेवक नरहरि सन्यासी के लिए की थी। इस ग्रन्थ में संन्यास का निर्णय किया है कि किसे, कब, किस प्रयोजन से, किस प्रकार से संन्यास लेना है। संन्यास का अर्थ है सम्यक् (अच्छी तरह) प्रकार से त्याग करना। त्याग अपने आप में कोई एक स्वतन्त्र मार्ग तो हो नहीं सकता क्योंकि जीव के कल्याण के लिए शास्त्र में तीन ही मार्ग बताये है – (१) कर्म मार्ग (२) ज्ञान मार्ग (३) भक्ति मार्ग । इन तीनो ही मार्गो में अपनी रूचि, अधिकार (योग्यता) एवं अवस्था के अनुसार व्यक्ति को अच्छी तरह चलने के लिए त्याग (संन्यास) का निरूपण हुआ है। अर्थात संन्यास या त्याग का निरूपण इन तीनो मार्गो के अंग रूप से हुआ है स्वतंत्र रूप से नहीं।
(१) कर्म मार्गीय संन्यास : कर्म मार्ग यानी प्रभु का माहात्म्य स्वीकार करके स्वयं के समस्त कर्म (यज्ञ –वर्णाश्रम आदि) को ईश्वर को अर्पण करना , खुद के स्वार्थ के लिए कर्म न करना क्योंकि समस्त चराचर सृष्टि भगवान की ही क्रीड़ा है। अतः व्यक्ति निष्काम कर्म मार्ग के द्वारा अपने अंतःकरण को शुद्ध कर के विषयासक्ति से निवृत्त हो जाता है एवं अपने में बिराजमान परमात्मा का सुख उठाता है। कर्म मार्ग के अंतर्गत ही आश्रम धर्म (ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यास) का भी पालन किया जाता है। इस चतुर्थ संन्यास आश्रम धर्म में गृह त्याग का विधान है। किन्तु इस कलियुग में त्याग धर्म की कठिनता (कलियुगी मनुष्यो का अल्प सामर्थ्य एवं अतिजरारोग इत्यादि)को ध्यान में रखते हुए एवं फलतः सोचे समझे बिना त्याग पश्चाताप का कारण बनता होने से श्री आचार्यचरण इस कलियुग में संन्यास आश्रम का निषेध कर रहे हैं।
(२) ज्ञान मार्गीय संन्यास : गुरु मुख से प्रभु के माहात्म्य ज्ञान को दृढ कर स्वयं की आत्मा को ब्रह्म में जोड़ देना ही ज्ञान मार्ग है। ज्ञान प्राप्ति के लिए यज्ञादि साधन की अपेक्षा होने से त्याग नहीं करना चाहिए। जब ज्ञान एवं वैराग्य दृढ हो जाय तभी संन्यास लेना है अन्यथा कलियुग के दोषो की प्रबलता से मलिन अंतःकरण के कारण पाषण्डिता हो जाती है । जो पश्चाताप का हेतु बनता है।
(३) भक्तिमार्गीय संन्यास : भक्ति का अर्थ है प्रभु का माहात्म्य ज्ञान पूर्वक उन प्रभु में सुदृढ़ सब से अधिक स्नेह होना।भक्ति की सिद्धि के लिए श्रवणादि नवधा भक्ति की आवश्यकता है। सत्संग एवं अन्य भकिमार्गीय साधन से नवधा भक्ति की सिद्धि होती है। सन्यास आश्रम के धर्म इन साधनो के विरोधी है। पूर्ण भक्ति के अभाव में त्याग करने पर दुष्ट संग एवं दुष्ट अन्न के कारण जीव का विषयासक्त होकर पाखंडी हो जाने की संभावना विशेष होने से भक्ति की अदृढ़ अवस्था में संन्यास (गृह त्याग) हानिकारक होने से नहीं करना चाहिए। भक्ति की दृढ अवस्था (व्यसन अवस्था ) में भगवान के विरह के अनूभव के लिए ही किया गया भक्तिमार्गीय त्याग को उत्तम कहा है। इस भक्तिमार्गीय त्याग में कलि दोष बाधा नहीं कर सकते क्योंकि इस मार्ग के रक्षक स्वयं श्री हरि ही है।
इस प्रकार से त्याग का स्वरुप जानकर ही गृह त्याग करना चाहिए अन्यथा जीव भ्रष्ट हो जाएंगे ऐसी श्री महाप्रभुजी की आज्ञा है। संकलन :योगेश गोस्वामी (मुम्बई –गोकुल-सप्तम गृह)।
संकलन :योगेश गोस्वामी (मुम्बई-गोकुल-सप्तम गृह)।
पुष्टिमार्ग में साधन भगवान की पुष्टि है एवं फल स्वयं भगवान श्री कृष्ण ही है । जब भक्त भगवान में निरुद्ध हो जाता है तब भगवान गुण और स्वरुप के भेद से उन उन भक्तो के लिए प्रकट होते है। भक्त के देह-इन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त-आत्मा-आत्मीय का कृष्ण भजन में विनियोग या तत्पर हो जाना पुष्टिमार्गीय निरोध है। जब तक भक्ति निरुद्ध अवस्था तक नहीं पहुचती है तब तक भक्ति की पूर्ण शुद्धता नहीं होती है क्योंकि संसारावेश भक्ति को अशुद्ध बनाता है । इस भक्ति की निरुद्ध अवस्था यानी निरोध की व्याख्या चार प्रकार से दी जा सकती है।
(1) निरोध का स्वरुप लक्षण : प्रपंच (जगत) को सर्वथा भूलकर भगवान में ही अनन्यतया आसक्त हो जाना । जो लोग हरि को छोड़कर संसार सागर में मग्न हो गए है वे तो संसार सुख-दुःख के जन्म-मृत्यु के चक्र में फसे हुए है किन्तु जो भक्त इस संसार को भूलकर श्री हरि में निरुद्ध हो जाते है वे तो दिन-रात दिव्य आनंद को प्राप्त करते है।
(2) निरोध का कारण लक्षण : इस जगत में भगवान के जिस स्वरुप एवं लीला के कारण भक्त प्रपंच को भूलकर भगवान में ही अनन्यतया आसक्त हो जाता है वह भगवान का स्वरुप एवं लीला इस निरोध का कारण मानी जाती है। अतः श्री कृष्ण के अवतार काल में प्रभु ने अपने स्वरुप एवं लीला के आकर्षण से भगवान भक्तो को अपने में निरुद्ध
करते है। प्रभु के अनवतार काल में भगवान के स्वरुप की सर्वसमर्पण पुर्विका सेवा एवं सेवा के अनवसर में भगवान के गुणगान और लीला अवगाहन का ऐसा माहात्म्य है की भक्त भगवान में निरुद्ध हो ही जाते है। प्रभु की सेवा-कथा मत्सर एव लोभ रहित होकर करनी है तभी वह फलदायी बनती है।
(3) निरोध का कार्य लक्षण : जिस भक्त में निरोध का स्वरुप दृढ हो जाता है उन्हें भगवान के संयोग एवं वियोग की अनूभूति तीव्रता से होने लगती है जैसे गोकुल में नन्द-यशोदा एवं गोपिकाओं को भगवान का गोचारणके लिए पधारने पर विप्रोयोग दुःख की अनुभूति होती थी एवं सायंकाल गोचारण कर भगवान के लौटने पर उन्हें संयोग सुख की अनुभूति होती थी। इसी तरह अवतार काल में जब उद्धवजी व्रज में पधारे तब वृजभक्तो को भगवद कथा में एक सुमहान उत्सव प्रकट हुआ ऐसा सुख रूप उत्सव अनवतार काल में भी भक्त को कथा श्रवण-कीर्तन-स्मरण में होने लग जाता है। ऐसे प्रभु सम्बन्धी सुख एवं दुःख का अनुभव तीव्रता से होने वाले प्रभाव को ही निरोध का कार्य कहा गया है।
(4) निरोध का प्रयोजन लक्षण : षोडश ग्रन्थ के अंतर्गत सेवाफल ग्रन्थ में सेवा में तीन फल (अलौकिक सामर्थ्य-सायुज्य-वैकुंठादि लोक में सेवोपयोगि देह की प्राप्ति) स्वीकारे है । यहाँ इस भूतल पर ही भगवान के दिव्य स्वरुप का अनुभव सर्व इन्द्रियों से होना ही अलौकिक सामर्थ्य
फल है जो निरोध की ही फलावस्था है किंतु इस देह के छूटने के बाद भगवान में सायुज्य की प्राप्ति या दिव्य वैकुण्ठ लोक में सेवोपयोगि देह की प्राप्ति पूर्व फल की तुलना में गौण फल है। यही तीन फल की प्राप्ति निरोध का प्रयोजन है।
श्री महाप्रभुजी स्वयं इस निरोध पदवी पर बिराजमान है एवं अनवतार काल में आधुनिक दैवी जीवो का निरोध करने के लिए ही आप ने यह पुष्टिमार्ग का उपदेश किया है। अतः इस निरोध से श्रेष्ठ कोई भी मन्त्र-स्तोत्र-विद्या-तीर्थ नहीं है । संकलन : योगेश रघुनाथ गोस्वामी (मुम्बई-गोकुल-सप्तम गृह कामा)।
इस ग्रन्थ में श्री महाप्रभुजी ने सेवा में तीन फल के स्वरुप एवं इन तीन फल की प्राप्ति में आते तीन प्रतिबन्ध के स्वरुप एवं उन्हें दूर करने के उपाय बताये है। यहाँ सेवा के तीन फल नहीं है किन्तु सेवा में तीन फल है अन्यथा कृष्णसेवा फलरूप न होकर साधनरूप हो जायेगी। श्री कृष्ण परमब्रह्म आनंद स्वरुप होने से फलरूप है। अतः कृष्ण सेवा भी फलरूप ही है अन्य किसी फल की प्राप्ति के लिए साधन रूप नहीं है। सेवा में फल तीन फल इस प्रकार है -:
(1) अलौकिक सामर्थ्य : जब भगवान की अति कृपा के कारण भक्तजन भगवान के दिव्यरूपो के दर्शन करते है तथा इसी विद्यमान देह से भगवान के साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते है जैसे मित्रो के साथ प्रेमभरी बाते की जाती है।
(2) सायुज्य : जब भक्त की विद्यमान यह देह छूट जाती है तब भी ऐसे भक्तो का अंतःकरण भगवान के सुन्दर रूपो में आसक्त हो जाने के कारण इन भक्तो के न चाहने पर भी उन्हें यह भक्ति भगवान में सायुज्य (भगवान में लय होना) प्राप्त कराती है। जिससे भक्तो के चारो पुरुषार्थ भी सिद्ध हो जाते है।
(3) वैकुंठादि दिव्य लोक में सेवोपयोगि देह की प्राप्ति : यह फल भी भक्त के विद्यमान देह छूटने के बाद ही प्राप्त होता है। इस दिव्य भगवद् लोक में भक्त भगवद् स्वरूपात्मक अलौकिक भोग प्राप्त करता है जिन्हें कालचक्र भी ग्रसित नहीं कर सकता है।
जब तक भक्त का चित्त भगवान में प्रवण नहीं हो जाता तब तक सेवा में यह तीन फल प्रकट नहीं हो पाते है क्योंकि चित्त का भगवान में प्रवण हो जाना ही सेवा का स्वरुप है। भगवान में चित्त प्रवण रूप सेवा का स्वरूप सिद्ध न होने में तीन बाधक निम्न प्रकार के है:-
(1) उद्वेग : लौकिक भोगासक्ति के कारण इस लोक में या मृत्यु के बाद परलोक में मेरा क्या होगा इस तरह का अपने अंतःकरण में विचार होना ही उद्वेग है। इस उद्वेग दूर करने के उपाय है:- आत्मनिवेदन का चिंतन-प्रभु के स्वरुप का चिंतन-लोक/वेद के व्यवहार में साक्षीभाव रखना-सेव्य स्वरुप की प्रसन्नता में ही सेवा के तात्पर्य का चिंतन- समग्र सृष्टि का प्रभु की लीला के रूप चिंतन-भगवद् शरणागति चिंतन ।
(2) लौकिक भोग : लौकिक विषयासक्त देह में कभी भी प्रभु का प्रवेश नहीं हो पाता है। अतः लौकिक भोग त्याज्य है।लौकिक भोग की सविघ्नता एवं अल्पता अनित्यता का विचार ही उसके त्याग का उपाय है। भगवद संबंधी समर्पित वस्तु के भोग को अलौकिक भोग कहते है वह त्याज्य नहीं बल्कि फलरूप है।
(3) प्रतिबन्ध : मानसिक-शारीरिक-पारिवारिक प्रतिबन्ध के कारण सेवा संभव नहीं ही पाती है। इसी तरह स्वयं के अहंकारवश अत्याग्रह के कारण सेवा एवं सेव्य स्वरुप की विस्मृति और स्वयं के आधीन अनधिकारी लोगों से बलपूर्वक सेवा कराने पर उनकी पीड़ा यह दोनो ही सेवा में बाधक होते है। इन प्रतिबन्ध का त्याग बुद्धि चातुर्यता से करना है।
यदि ऊपर बताये सेवा के प्रतिबन्ध जीव के कई प्रयत्न करने पर भी यदि दूर करना शक्य न हो तो ऐसी भावना रखनी चाहिए की अभी भगवान को फलदान देने की इच्छा नहीं है। अतः प्रभु सब कुछ स्वयं की इच्छा से ही करेंगे ऐसा विवेक बनाये रखकर प्रभु के शरण रहना। यदि यह भी शक्य न हो तो अभी संसार ही निश्चित है यही प्रभू इच्छा समझनी है। जिनका पुष्टिमर्यादा में प्रभु ने अंगीकार किया है उन्हें तो सेवाफल का चिंतन अवश्य करना है कि जिससे फलान्तर का अन्याश्रय न हो एवं यहाँ बताये प्रतिबंधो का चिंतन भी करे की जिससे सेवा में बाधक कारणों से दूर रहा जाय। इसके अलावा अन्य का विचार श्रीमहाप्रभुजी की वाणी से अन्यथा होने से केवल भ्रम ही है।संकलन :योगेश रघुनाथ गोस्वामी (मुम्बई-गोकुल-सप्तमगृह)।