Shree Shyam Manoharji Goswami
Shri Vallabhpushti
सभी दैवीजीवो (दुष्टसाधन-सुसाधन-निःसाधन) का उद्धार करने के लिए परंब्रह्मपरमात्मा भगवान श्री कृष्ण प्रादुर्भूत हुए।जिससे सभी लोग उनके दर्शन कर सके और सभी का उद्धार हो सके। अतः भगवान का प्रादुर्भाव इनकी पुष्टि का ही सूचक है। यदि प्रभु को अनुकम्पा (पुष्टि) करने की इच्छा न होती तो स्वतंत्र और आप्तकाम भगवान लोक व्यवहार्य ही नही बनते।इन भगवान श्री कृष्ण का अवतार सर्वोद्धारार्थ ही होता है और विशेष कर अपने भक्तो को भक्ति का दान करने के लिए होता है केवल धर्म रक्षाआदि के लिए नही क्योंकि धर्म रक्षा आदि कार्य तो भगवान अंशरूप से अवतरित होकर ही कर लेते है। इन कार्यो के लिए उनके पूर्ण प्रादुर्भाव की अपेक्षा नही होती। भगवान ने कुछ जीव का उद्धार अपने मूल ‘रूप’ द्वारा अपने पूर्णावतार श्रीकृष्ण के रूप मे किया । किन्तु बाद मे अन्य जीवो का ‘नाम’ द्वारा उद्धार करने की इच्छा से भगवान श्रीकृष्ण ने ही वेदव्यासजी के रूप मे श्रीमद् भागवत महापुराण का प्रकाशन किया क्योंकि यह श्रीभागवतपुराण भगवान श्री कृष्ण का ही नामात्मक स्वरूप है। श्रीभागवत तभी उद्धारक हो सकता है जब इसका यथार्थ ज्ञान हो । इस यथार्थज्ञान का ही प्रकाशन करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद स्वरूप श्रीवल्लभ का प्राकट्य हुआ। इस कलिकाल मे बड़े बड़े ज्ञानीजन भी भगवान के माहात्म्य ज्ञान को जान नही पाते है। ऐसी स्थिति मे देवी जीव भगवान की भक्ति से बहिर्मूख होकर लौकिक मे आसक्त हो रहे थे। तब श्री हरि को देवी जीव पर दया आई । अतः प्रभु ने अपनी वाणी द्वारा अपने माहात्म्य को प्रकट करने के लिए कृपा करके स्वयं अपने मुखारविंद को प्रकट किया जिन्हें हम सभी श्रीवल्लभ कहते है क्योंकि सभी देवी जीवो के एवं प्रभु के भी श्रीमहाप्रभुजी वल्लभ (प्रिय) है। यह भगवान की पुष्टि ही श्री वल्लभ के रूप मे प्रकट हुई है। अतः वल्लभपुष्टि से हम सभी जीव को प्रभु के स्वरूप का ज्ञान हो की जिससे हम दैवी जीव प्रभु की द्रढ़ भक्ति कर पाये।
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